वैकुण्ठ के द्वार पर पहरेदार पूछते, दिल कितना हल्का है? एक साधु ने रोटी बाँटी, मन की धूल झाड़ी। तभी द्वार खुला, मधुर शंख बजे।
लोककथा कहती— प्रवेश धन से नहीं, करुणा से होता है। सच, सेवा और मुस्कान ही कुंजी। आज से मन हल्का करें; द्वार अपने-आप खुलें।
वैकुण्ठ के द्वार पर पहरेदार पूछते, दिल कितना हल्का है? एक साधु ने रोटी बाँटी, मन की धूल झाड़ी। तभी द्वार खुला, मधुर शंख बजे।
लोककथा कहती— प्रवेश धन से नहीं, करुणा से होता है। सच, सेवा और मुस्कान ही कुंजी। आज से मन हल्का करें; द्वार अपने-आप खुलें।