नारायण सूक्त सर्वव्यापक प्रेम का स्तुति-गान है। वह कहता: सबमें वही, इसलिए सब अपने हैं। यही वैष्णव धारा का बीज है।
गीता इस प्रेम को कर्म-भक्ति का मार्ग बनाती। श्रीकृष्ण सिखाते: निष्काम कर्म, समत्व, सेवा। आज से प्रेम और सेवा जीकर, भीतर के नारायण को जागृत करें।