नटराज की मुद्रा में ब्रह्मांड की कथा, डमरू से सृष्टि गूँजती, अग्नि में बाधाएँ पिघलती हैं। लय में ब्रह्मांड झूमता।
पाँव तले अज्ञान कुचला, अभय हाथ कहे: निडर रहो। अग्नि-वृत्त बोले: बदलो, बनो, बढ़ो। आज ही अपने भीतर का नटराज जगाओ।
नटराज की मुद्रा में ब्रह्मांड की कथा, डमरू से सृष्टि गूँजती, अग्नि में बाधाएँ पिघलती हैं। लय में ब्रह्मांड झूमता।
पाँव तले अज्ञान कुचला, अभय हाथ कहे: निडर रहो। अग्नि-वृत्त बोले: बदलो, बनो, बढ़ो। आज ही अपने भीतर का नटराज जगाओ।